Wednesday, 8 August 2007

सारी दुनिया से भटककर...

सारी दुनिया से भटककर यहीं आ जाऊंगा
मैं तेरा ये शहर नहीं छोड़ पाऊंगा !

मस्तमौला आगाज़ बचपन का हुआ यहीं पे
यहीं जवानी के पहले सपने को मचलते भी देखा,
हंसी-ठहाकों ने अपना कभी डेरा जमाया यहाँ
यहीं सारी हसरतों को जलते भी देखा !

चाहा था जिसे दिल से, उसे यहीं पर खोया
ना था जो अपना कभी, उसकी खातिर कितना रोया !
मेरे आँसू तक ने हरदम धिक्कारा खुद को,
कैसे इन सबसे कभी नाता तोड़ पाऊंगा !

सारी दुनिया से भटककर यहीं आ जाऊंगा
मैं तेरा ये शहर नहीं छोड़ पाऊंगा !

इसी जगह पे किसी ने वादा किया साथ देने का
तमन्नाओं ने महसूस की थी यहीं पर अपनी उठान,
यहीं पर हवाओं ने फिर रुख बदलना किया शुरू
जिन्दगी के सफ़र में यहीं पर देखी मनचली ढलान !

लोग सारे अपने क्यों पराए दिखने लगे हैं
रिश्ते वे जज्बात के क्यों मोल बिकने लगे हैं !
दिल मेरा रह-रहकर बेजार हुआ जाता है,
कैसे इन मुश्किलों से कभी मुँह मोड़ पाऊंगा !

सारी दुनिया से भटककर यहीं आ जाऊंगा
मैं तेरा ये शहर नहीं छोड़ पाऊंगा !

जहाँ हम दोस्तो की जमा करती थी बेबाक महफ़िल
वही चौराहा आज कितना सूना हो गया है,
यही वो मकाम है जहाँ हमने हार ना मानी कभी
आज किसी की आह का वही नमूना हो गया है !

हर किसी पर यहाँ फिर भी अपना प्यार रहेगा
टुकड़ों में बँटा आंखों का वो सपना बरकरार रहेगा !
जीवन की पटरी को नए आयाम से कभी तो सुकून मिले
तभी इन रास्तों को नए रास्ते से जोड़ पाऊंगा !

सारी दुनिया से भटककर यहीं आ जाऊंगा
मैं तेरा ये शहर नहीं छोड़ पाऊंगा !

- "प्रसून"

1 comment:

Pintoo said...

wahhhhhh
kya khoob !!!!!!!!!
Nityanand
New Delhi